*बोलना सीख जाओ तो दुनिया जीत जाओ*
हर वक्त हर जगह बोलना जरूरी नहीं है। कभी-कभी हमारी चुप्पी भी बहुत कुछ कह जाती है। अक्सर यह पाया गया है कि हम आवेश में कुछ भी बोल देते हैं और फिर पश्चाताप होता है।
जब भी हम गुस्से में हो तब मौन धारण करना उचित है। इस दुनिया में बोलने से जितने संबंध बिगड़े हैं, उससे तो हाथापाई करने से भी नहीं बिगड़े होंगे। कई लोग कठोर वचन बोलने में गर्व महसूस करते हैं। किंतु यह सही नहीं।
स्पष्ट बोलना अच्छा है किंतु समय की नजाकत देखकर। स्पष्ट का मतलब कठोर नहीं, किंतु कोमल वचन होना चाहिए।
*क्यूं बोलना है, कब बोलना है, किससे बोलना है, क्या बोलना है, कैसे बोलना है, कितना बोलना है वगैरह, एक कला है।* जिसने यह कला में महारत हासिल करी, मानो उसने ज़िंदगी जीत ली।
आओ ईश्वर से प्रार्थना करें कि हमें बोलने की कला में महारत प्रदान करें!
तथास्तु! स्वस्ति सिद्धं! आमीन! सो बी इट!
