*जिंदगी की अनिश्चितता को स्वीकार करके निश्चिन्त हो जाइए*
कभी-कभी हम जिस चीज को दिल से चाहते हैं वह मिल जाने पर भी हमें खुशी नहीं होती। अक्सर होता है ऐसा है कि समय के साथ-साथ हमारी पसंद भी बदलती है और जो जिस चीज के लिए हम कभी दौड़ते थे, वह चीज सामने आने पर भी हमें आकर्षित नहीं करती। यही तो समय की बलिहारी है।
हमारा जीवन हर पल बदलता है। हमारी पसंद ना पसंद, आकर्षण, प्राथमिकताएं, संबंध, सब कुछ समय के अनुसार बदलता रहता है। यही तो जीवन है। एक गुजराती कविता क्या खूब लिखा है…
*જ્યાં પહોંચવાની ઝંખના વર્ષોથી હોય,*
*ત્યાં પહોંચતા જ મન પાછું વળે એમ પણ બને!*
इसका मतलब है कि जहां पहुंचने की हमें वर्षों से तमन्ना थी, वहां पहुंचने के बाद भी हमें खुशी नहीं मिली।
ऐसे अनिश्चित विश्व में उचित यही है, कि हमें जो मिला है और हमें जो पसंद है इसका भरपूर आनंद उठाएं। आज की तारीख में हमें जो अच्छा लगता है, उसे अपनाए और मौज में रहे ।
आओ ईश्वर से प्रार्थना करें कि हमें इस अनिश्चित विश्व में निश्चिन्त चित् दे!
तथास्तु! स्वस्ति सिद्धं! आमीन! सो बी इट!
