आपको, आपके परिवार एवं मित्रों को दिव्य प्रज्ञा परम सिद्ध श्री श्री महावतार बाबाजी पराशक्ति चिकित्सा और आशीर्वाद प्रदान करतें हैं!
*गुरुपूर्णिमा की आपको मंगलमय बधाई और सादर प्रणाम!*
*बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा।*
*सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।*
*अमिअ मूरिमय चूरन चारू।*
*समन सकल भव रुज परिवारू॥*
भावार्थ- मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुंदर स्वाद), सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है।
*”गुरु*” एक तत्त्व है जो किसी में भी प्रगट हो सकता हैं।। हमें उस तत्त्व से जुड़ना है।
*मेरे गुरु के बिना मैं अधूरा, असमर्थ हूं, पर मेरे गुरु के साथ मैं पूरा और समर्थ हूं!*
आध्यात्म में गुरु आपको ढूंढ लेते है और आपको मोक्ष के मार्ग पे लेके जाते है।। गुरु हमें शिक्षा भी देते है और परीक्षा भी लेते है। हमें गुरु के साथ जुड़े रहना है।। गुरु हमारे साथ सूक्ष्म रूप से जुड़े होते है, इसलिए उनकी भौतिक हयाती ना होते हुए हम उनकी हाजरी महसूस कर सकते है। वह हमेशा हमारी रक्षा करते रहते है।।
इसीलिए कहते है ….
*”गुरुजी”* – *जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी*
आओ ईश्वर से प्रार्थना करें कि हम हमारे गुरु से सदैव जुड़े रहे और हमें हमारे गुरुजी का आशीर्वाद मिलता रहे!
तथास्तु! स्वस्ति सिद्धं! आमीन! सो बी इट!
